देवर्षि नारद का घमंड टूटना और नारद जी का भगवान् विष्णु को श्राप देना

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केवल यही सत्य नहीं है कि सिर्फ ईश्वर ही मनुष्य को उसके कर्मों की सजा देते हैं या जन्म-मरण निर्धारित करते हैं। कई बार ईश्वर को भी शापित होना पड़ा है। और ईश्वर ने अनेक कष्ट सहकर भी स्वयं को मिले इन श्राप को सहा है ताकि ये श्राप देनेवाले व्यक्तियों का मान बना रहे। ईश्वर भी स्वयं भक्तो के वश में रहते है और भक्तो के लिए कष्ट भी सहते है आइये ऐसी ही एक कथा के बारे में हम आज आपको बताते है। जिसमे देवर्षि नारद का घमंड टूटना और नारद जी का भगवान् विष्णु को श्राप देना..

नारदजी द्वारा भगवान विष्णु की कठोर साधना

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एक बार नारदजी भगवान विष्णु की साधना में बैठ गए। उन्होंने वर्षो तक श्री हरि की कठोर साधना करी । नारद मुनि को तप करते देख देवराज इंद्र को लगा कि कहीं नारद अपने तप के बल स्वर्ग की प्राप्ति तो नहीं कर लेगे।

तब इंद्र ने स्वर्ग की अप्सराओं को नारद मुनि का तप भंग करने के लिए भेजा परन्तु उनकी माया का कोई भी प्रभाव नारदजी पर नहीं हुआ और अप्सरा सहित कामदेव स्वर्ग को लौट गए।

कामदेव की माया से मुक्त रहने पर देवर्षि नारद को इस बात का घमंड हो गया था कि कामदेव भी उनकी तपस्या व ब्रह्मचर्य को भंग नहीं कर पाए।

सबसे पहले नारदजी अपने पिता ब्रह्माजी के पास गए और तपस्या पूरी होने की जानकारी दी इसके बाद देवर्षि नारद ने यह बात भगवान शंकर को बताई।

लेकिन महादेव ने कहा कि हे देवर्षि नारद इस बात को भगवान विष्णु के सामने इतने अभिमान के साथ नहीं कहना

भगवान शिव के मना करने के बाद भी नारद मुनि ने यह बात भगवान विष्णु को उसी तरह बताई। तब भगवान समझ गए की नारद मुनि में अहंकार आ गया है।



श्री हरि ने नारद जी के उस अहंकार को ख़तम करने के लिए एक योजना बनायीं ।

राजकुमारी को देख कर नारद जी का वैराग्य को भूल जाना

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नारद मुनि भगवान विष्णु को प्रणाम कर बैकुंठ से लौट रहे थे । तो उन्हें एक भव्य नगर दिखाई दिया । यह नगर श्रीहरि ने अपनी योगमाया से निर्मित किया था।

नारद अपनी धुन में होने के कारण कुछ समझ नहीं पाए और इस नगर के राजमहल में पहुचें।

राजा ने उनका भव्य स्वागत किया और अपनी पुत्री को बुलाकर नारद मुनि से कहा कि मुझे अपनी राजकुमारी का स्वयंवर करना है।

आप इसका हाथ देखकर इसके भविष्य के बारे में कुछ बताइए। जब नारद जी ने उस कन्या का हाथ देखा तो उसकी रेखाओं के अनुसार, उसका पति विश्व विजेता रहेगा और समस्त संसार उसके चरणों में नतमस्तक होगा। 

नारद जी ने यह बात राजा को ना बताकर दूसरी अच्छी बातें कहीं और वहां से चले गए।

अब राजकुमारी का रूप देखकर नारद जी वैराग्य को भूल चुके थे।

राजकुमारी का सुंदर रूप नारद मुनि के तप को भंग कर चुका था। जिस कारण उन्होंने इस स्वयंवर में हिस्सा लेने का मन बना लिया । भगवान विष्णु की माया के कारण यह सब हो रहा था।

स्वयंवर के कारण नारद जी ने भगवान विष्णु से सुन्दर रूप की कामना करना

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राजकुमारी को पाने की इच्छा में नारद अपने स्वामी भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे और उनके जैसा रूप पाने की अपनी इच्छा श्री हरी को बताई और भगवान विष्णु ने नारद की वो मनोकामना पूरी कर दी।

भगवान द्रारा मनोकामना पूरी किये जाने के बाद वो अत्यंत प्रसन्न हो कर बैकुंठलोक से उस नगर की और चल दिए।

नारद जी यह भी भूल गए की भगवान विष्णु के अनेक रूप है और प्रभु ने उन्हें कौन सा रूप प्रदान किया है। भगवान विष्णु का उन्ही अनेक रूपों में से एक रूप एक वानर रूप भी है।

नारद के अहंकार को भगवान विष्णु द्वारा तोडना और नारद का भगवान विष्णु को श्राप देना

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हरि रूप लेकर नारद उस स्वयंवर मे पहुंच गए। उन्हें अपने आप पर इतना अभिमान हो गया था कि उन्होंने एक बार भी अपना चेहरा नहीं देखा।

नारद को इस बात का विश्वास हो गया था कि हरि रूप को देखकर राजकुमारी उन्हीं के गले में वरमाला पहनाएगी।

जब राजकुमारी वर का चयन करने स्वयंवर में आयी तो वानर रूपी मुख देख कर राजकुमारी को हंसी आगयी और बोली इस स्वयंवर में आने से पूर्व आपने अपने मुख को तो देख लिया होता।

नारद के रूप को देखकर जब उनकी हंसी उड़ाई गई तो उन्होंने सरोवर में जाकर अपना चेहरा देखा और उन्हें भगवान विष्णु पर क्रोध आगया।

उसी समय क्रोधित होकर नारद जी ने भगवान विष्णु को श्राप दे दिया और कहा कि जैसे में स्त्री के लिए व्याकुल था वैसे ही आप भी मनुष्य रूप में जन्म लेकर स्त्री के वियोग से व्याकुल होकर धरती पर जगह -जगह भटकेंगे और उस समय वानर ही आप की मदद करेंगे ।

लेकिन जब भगवान की माया का प्रभाव समाप्त हुआ तब नारद जी को अपनी बहुत बड़ी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने भगवान श्री हरी से  तुरंत क्षमा मांगी। नारद के दोनों ही श्राप फलीभूत हुए।

उसी श्राप के कारण भगवान विष्णु को राम के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेना पड़ा और माता सीता का वियोग सहते हुए १४ वर्षो तक वनवास भी सहना पड़ा और वानरों की सहायता भी लेनी पड़ी ।

 

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