सोरों सूकर क्षेत्र एक रहस्मयी तीर्थ स्थान- Soron Sukar Kshetra

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यह स्थान जगत की उत्पत्ति का केन्द्र माना जाता है और सोरों (सोरों शूकर क्षेत्र) के तीर्थपुरोहित जगत् विख्यात हैं। सोरों सूकरक्षेत्र भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में कासगंज (काशीराम नगर) जिले का एक नगर है । सोरों (सोरों शूकर क्षेत्र) एक रहस्मयी तीर्थ स्थान- Soron Sukar Kshetra आइये अब आप को सोरों शूकर क्षेत्र के बारे में विस्तार से बताते है।


सोरों को क्यों कहाँ जाता है सोरों सूकरक्षेत्र- Soron Sukar Kshetra

 

भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष नामक दैत्य का वध करने के लिए वराह रूप अथार्त शूकर रूप धारण कर भगवान ब्रह्माजी के नासिका इसी जगह प्रगट हुए और उस दैत्य का वध करने के बाद यही पर उस देह का परित्याग किया तभी से इसे सोरों शूकर क्षेत्र कहाँ जाता है।


सोरों का प्राचीन इतिहास

इस तीर्थ का पौराणिक नाम 'ऊखल तीर्थ' है।और कालांतर में वराह अवतार से पूर्व कोकामुख कुब्जाभ्रक तीर्थ के नाम से यह विख्यात था।और वर्तमान में इसे सोरों शूकर क्षेत्र कहाँ जाता है। सूकर क्षेत्रको चालुक्य वंश ,सोलंकी क्षत्रियों की राजधानी भी माना जाता है । स0 900 ई0 के लगभग यहा के शासक सोमदत्त सोलंकी थे।

 

सोरों सूकर क्षेत्र स्थित वराह भगवान का भव्य मंदिर

soron-sukar-kshetra-ek-rahasmayee-teerth-sthaanयहाँ वराह भगवान का भव्य मंदिर है कहा जाता है कि भगवान विष्णु की देवताओ द्वारा स्तुति करने पर भगवान वराह का रूप धारण कर इसी सोरों शूकर क्षेत्र मे ब्रम्हाजी की नासिका से 12 अंगुलमात्र प्रगट हुऐ|

वराह भगवान ने दैत्य से युद्ध कर उसका वध किया। और पृथ्वी को मुक्त करके , अपने अवतार के उद्देश्य पूरा करने के बाद, निज देह का परित्याग इसी सोरों सूकर क्षेत्र मे किया।


सोरों सूकर क्षेत्र तुलसीदास की जन्म भूमि


रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी श्री तुलसीदास जी का जन्म यहीं  सूकर क्षेत्र में हुआ और तुलसीदास जी की शिक्षा-दीक्षा भी यहीं श्री नृसिंह पाठशाला में संपन्न हुई थी।

गंगाजी के मध्य गोस्वामी श्री तुलसीदास जी की सुंदर प्रतिमा उनके स्मारक के रूप में आज भी मौजूद है।

तुलसीदास जी के मकान के जीर्णावशेष आज भी यहाँ मौजूद हैं।और उनके वंसज एवं उनके गुरुजी के वंसज आज भी जीवित है।


सोरों स्थित कुआ जिसका जल एक दिन के लिए दूध का रूप ले लेता है।



यहाँ एक ऐसा कुआ है जिसका जल आज भी चैत्र शुक्ल नवमी को दूध का रूप ले लेता है। कहा जाता है चंद्रदेव ने अपने शाप से मुक्ति के लिए इस पावन धरा पर सहस्रों वर्ष कभी शिरोमुख कभी अधोमुख होकर नाना प्रकार से तपस्या करी थी जिससे भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें न केवल शापमुक्त किया और वर भी दिया की दिया कि हे चंद्रदेव ! तुम्हारी साधना के प्रभाव से वर्ष में एक दिन यहां का जल दूध का रूप ले लेगा और यह स्थान जगत में विख्यात हो जायेगा।



सोरों में मृत आत्माओं की मुक्ति के लिए गंगा का विशाल कुंड साक्षात पर्व के रूप में विद्यमान है

 

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यहाँ पतित पावनी गंगा मैया भी यहां विधमान है।और यह विश्व का एकमात्र स्थल है। जहाँ पर श्री हरि गंगा का विशाल कुंड में अस्थिया मात्र 3 दिन में गल जाती है। यहाँ श्रद्धालु दूर दूर से अपने पितेश्वरों का श्राद्ध कर्म करने यहाँ आते है। ताकि उनके पितरो को शांति और मोक्ष की प्राप्ति हो सके।



सोरों में महाप्रभु बल्लभाचार्य की बैठक सिक्ख सम्प्रदाय के गुरू अर्जूनदेव जी, व जैनधर्म प्रर्वतक श्री पारस नाथ की सनद

 

महाप्रभु बल्लभाचार्य की बैठक बल्लभ संप्रदाय के अनुसरण करने वालो की आस्था का केंद्र उनकी बैठकों में से तेईसवीं बैठक इसी पावन भूमि सोरों सूकर क्षेत्र पर स्थित है।और यहाँ विट्ठलनाथ जी की व गुंसाइ जी की भी बैठक विद्यमान है।

बंगाल के संत श्री चैतन्य महाप्रभू जी महाराज,एवं बल्लभाचार्यजी महाराज ने भी पर्दापण किया, दोनो आचार्यो की चरण पदुकाये यहाँ पर स्थापित हैं।और अर्जूनदेव जी, व जैनधर्म प्रर्वतक श्राी पारस नाथ की सनद भी यहाँ पर मौजूद है।


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भगवान राम और कृष्ण से सोरों का सम्बन्ध



ऐसा कहा जाता है के भगवान श्रीराम तीर्थ यात्रा करते हुऐ इस पावन क्षेत्र में पधारे और अपने पितेश्वरों का श्राद्ध कर्म यहाँ पर किया।

इसके अलावा भगवान श्री श्रीकृष्ण अपने भाई श्री बलराम जी के साथ यहा पर गाय चराने के लिए आते थे। जो आज भी बछरू स्थान के नाम से मौजूद है।


सोरों शूकर क्षेत्र भगवान सूर्य व चंद्र देव से लेकर महात्मा कपिल और महात्मा भागीरथ की तपोभूमि

 

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यहाँ पर भगवान सूर्य ने तपस्या की है उनका स्थान सूर्यकुन्ड के नाम से आज भी मौजूद है|और इसी पुण्य क्षेत्र में चन्द्र देव ने भी यहा तपस्या की है, उनका स्थान, दूधाधारी के नाम से जाना जाता है।यह स्थली महात्मा कपिल की तपस्थली और महात्मा भागीरथ की तपोभूमि के रूप में भी जानी जाती है। 


श्री ग्रधवट तीर्थ इस पवित्र भूमि के अंदर ही ‘ग्रधवट तीर्थ’ है।

 

विश्व में कुछ वृक्ष अत्यंत पुराने समय से आज भी पृथ्वी पर मौजूद है इसी में से एक आदिकालीन विश्व का एक मात्र प्राचीनतम वटवृक्ष ‘ग्रधवट’ विद्यमान है।

दुनिया के कुछ सर्वाधिक प्राचीन वृक्षों में एक अभयवट (इलाहाबाद) प्रयाग में वृंदावन में वंशीवट उज्जैन में सिद्धवट ,एवं ग्रधवट सोरों सूकर क्षेत्र सोरों में माने गए हैं।



सोरों सूकर क्षेत्र में अन्य प्राचीन मंदिर और गंगा घाट 

यहाँ पर कई प्रमुख मंदिर एवं दर्शनीय स्थल हैं...


  • वराह भगवान का मंदिर
  • गंगा माता का मंदिर
  • लड्डू वाले बालाजी महाराज का मंदिर
  • योगेश्वर मन्दिर
  • श्याम जी का मंदिर 
  • सीताराम मंदिर
  • सोमेश्वर मंदिर
  • दूधाधारी मंदिर 
  • रामछितौनी मंदिर
  • बटुकनाथ मंदिर 
  • माता चौरासी घंटे वाली मंदिर
  • वनखंडेश्वर महादेव का मंदिर 
  • बूढ़ी गंगा का मंदिर 
  • चैतन्य महाप्रभुजी का मंदिर 
  • सूरजकुंड
  • सोरों और कासगंज के मध्य स्थित भगीरथ जी की गुफा
  • तुलसीदास की पत्नी रत्नागिरी का समाधी स्थल
  • गंगा के चारो और देवी देवताओ के मंदिर है
यहाँ पर परिक्रमा करने वाले लोग घाटों पर मछलियों को भोजन देते है।



सोरों सूकर क्षेत्र की महिमा


सोरों सूकर क्षेत्र  अत्यंत प्राचीन और धार्मिक नगरी है यहाँ महाभारत से लेकर बौद्ध तक का इतिहास इस नगरी से किसी न किसी रूप से सम्बंधित रहा है । और स्वयं महात्मा बुद्ध ने यहाँ कई बार पदापर्ण किया, ऐसा माना जाता है, कि बौद्ध ग्रन्थो मे सोरो के लिए सोरम्य लिखा गया हैं। सोरों सूकर क्षेत्र की महिमा के बारे में वराहपुराण , मत्स्य पुराण आदि में इसका विवरण मिलता है|

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